नई दिल्ली/हल्द्वानी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को निर्देश दिया कि रेलवे परियोजना के लिए आवश्यक सरकारी भूमि पर रह रहे और बेदखली का सामना कर रहे परिवारों के पुनर्वास हेतु विशेष शिविर आयोजित किया जाए। इस शिविर में पात्र परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन कर सकेंगे।
याचिकाकर्ताओं के अनुरोध पर अदालत ने कहा कि शिविर रमजान के बाद आयोजित किया जाए। इसके अनुसार 19 मार्च से एक सप्ताह का विशेष कैंप लगाया जाएगा और पूरी प्रक्रिया 31 मार्च से पहले पूरी करने को कहा गया है। अदालत ने नैनीताल के जिलाधिकारी व अन्य राजस्व अधिकारियों को आवश्यक सहयोग देने के निर्देश दिए हैं। यह मामला उत्तराखंड हाईकोर्ट के दिसंबर 2022 के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें हल्द्वानी में सार्वजनिक भूमि पर कथित अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए गए थे। जनवरी 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी थी, जिसे समय-समय पर बढ़ाया जाता रहा है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ कर रही है। अदालत ने कहा कि अतिक्रमण करने वालों को उसी स्थान पर रहने का अधिकार नहीं है और न ही वे रेलवे भूमि के उपयोग का निर्णय कर सकते हैं।
पुनर्वास को लेकर कोर्ट के निर्देश
- प्रभावित परिवारों की सूची तैयार कर पात्र लोगों को आवास योजना के लिए आवेदन में सहायता दी जाए।
- बनभूलपुरा में पुनर्वास केंद्र बनाया जाए, जहां परिवार का मुखिया आवेदन कर सके।
- सामाजिक कार्यकर्ता घर-घर जाकर योजना की जानकारी दें।
- सभी पात्र परिवारों को योजना का लाभ सुनिश्चित किया जाए।
अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्व प्राधिकरण, केंद्र और राज्य सरकार मिलकर शिविर संचालित करें।
क्यों जरूरी है भूमि खाली कराना?
भारतीय रेलवे के अनुसार ट्रैक विस्तार और अन्य परियोजनाओं के लिए यह भूमि अत्यंत आवश्यक है। नदी के कारण मौजूदा ट्रैक में तकनीकी दिक्कतें आ रही हैं और इसके बाद पहाड़ी क्षेत्र शुरू होने से विस्तार के विकल्प सीमित हैं।
करीब 30 हेक्टेयर रेलवे भूमि पर बनभूलपुरा, गफूर बस्ती समेत कई इलाकों में हजारों अवैध निर्माण हैं, जहां अनुमानित 5,000 से अधिक परिवार (करीब 50 हजार लोग) रह रहे हैं।
याचिकाकर्ताओं और सरकार का पक्ष
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि लोग दशकों से यहां रह रहे हैं और कई पट्टे वाली जमीन पर बसे हैं। उन्होंने पास की खाली जमीन के उपयोग का सुझाव भी दिया और कहा कि एक साथ इतने परिवारों को आवास उपलब्ध कराना व्यावहारिक नहीं है।
केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि पात्र परिवारों को विस्थापन के बाद छह माह तक प्रति माह 2,000 रुपये भत्ता दिया जाएगा। राज्य सरकार और रेलवे ने संयुक्त रूप से प्रभावित परिवारों की पहचान और पुनर्वास का आश्वासन दिया है।
अगली सुनवाई अप्रैल में
अदालत ने कहा कि अगली सुनवाई अप्रैल 2026 में होगी। तब तक रेलवे भूमि से अतिक्रमण हटाने की कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। केंद्र ने यह भी बताया कि कुछ जमीनें फ्रीहोल्ड हैं और मुआवजा राज्य सरकार व रेलवे मिलकर देंगे।


