पश्चिम एशिया में अमेरिका और इस्राइल की ओर से ईरान पर किए गए हमलों और इसके जवाब में तेहरान के पलटवार ने अब पूरी दुनिया को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया है। ईरान की ओर से क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने और ऊर्जा ढांचों पर हमलों के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही लगभग रोक दी। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि दुनिया की करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस जरूरतें इसी रास्ते से पूरी होती हैं।
28 फरवरी से शुरू हुआ यह संघर्ष अब दसवें दिन में पहुंच चुका है। इतने कम समय में ही दुनिया भर के शेयर बाजारों में गिरावट देखी जा रही है और ऊर्जा बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई है। तेल और गैस की आपूर्ति घटने से कई देशों को अपनी ऊर्जा जरूरतों का प्रबंधन करने के लिए आपात कदम उठाने पड़ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति लंबी चली तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है और महंगाई भी बढ़ सकती है।
तेल-गैस भंडारों पर हमले, उत्पादन प्रभावित
युद्ध और आपूर्ति में कटौती के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भारी दबाव है। ब्रेंट क्रूड की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है, जो रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पहली बार हुआ है। सिर्फ एक सप्ताह में तेल की कीमतों में लगभग 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
ईरानी ड्रोन हमले के बाद कतर की मुख्य एलएनजी निर्यात सुविधा बंद हो गई है, जिससे वैश्विक गैस आपूर्ति बाधित हो गई है। वहीं सऊदी अरब की अरामको, कुवैत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और बहरीन की बैपको एनर्जीज की रिफाइनरियों पर भी हमलों का असर पड़ा है। कई देशों ने तेल और गैस आपूर्ति अनुबंधों पर अस्थायी रोक लगाते हुए फोर्स मैज्योर घोषित कर दिया है। इससे मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन पैदा हो गया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बंद, वैश्विक सप्लाई प्रभावित
ईरान की चेतावनी के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही लगभग रुक गई है और 200 से अधिक तेल टैंकर मार्ग में फंसे हुए हैं। यह मार्ग वैश्विक तेल और एलएनजी आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत संभालता है।
मार्ग बंद होने से सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक और कुवैत जैसे प्रमुख उत्पादकों को लगभग 14 करोड़ बैरल तेल की शिपमेंट रोकनी पड़ी है। 2025 में एशियाई देशों ने इसी मार्ग से 87 प्रतिशत कच्चा तेल और 86 प्रतिशत एलएनजी आयात किया था। अब इसके बंद होने से एशिया और यूरोप दोनों क्षेत्रों में ईंधन संकट गहराने की आशंका बढ़ गई है।
जहाज फंसे, माल ढुलाई और बीमा महंगा
टैंकरों के फंसने और ईंधन महंगा होने से समुद्री माल ढुलाई की दरें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। पश्चिम एशिया से चीन तक तेल ले जाने वाले सुपरटैंकर का किराया लगभग दोगुना होकर 4 लाख डॉलर प्रतिदिन तक पहुंच गया है।
अटलांटिक क्षेत्र से एशिया तक एलएनजी ले जाने वाले जहाजों का किराया छह गुना बढ़ गया है। साथ ही समुद्री हमलों के खतरे को देखते हुए बीमा कंपनियों ने जहाजों के प्रीमियम भी बढ़ा दिए हैं। इससे ऊर्जा की कुल लागत और बढ़ने का खतरा है।
एशिया में सबसे ज्यादा असर
चीन:
चीन के पास लगभग 1.3 अरब बैरल का तेल भंडार है, लेकिन घरेलू आपूर्ति सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने डीजल और पेट्रोल के निर्यात पर रोक लगा दी है।
पाकिस्तान:
सरकार ने ईंधन की कीमतों में भारी बढ़ोतरी की है और ईंधन बचाने के लिए वर्क फ्रॉम होम तथा ऑनलाइन कक्षाओं पर विचार किया जा रहा है।
बांग्लादेश:
घबराहट में खरीदारी रोकने के लिए ईंधन बिक्री पर प्रतिबंध लगाए गए हैं। बिजली बचाने के लिए विश्वविद्यालयों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है।
जापान और दक्षिण कोरिया:
जापान ने अपने राष्ट्रीय तेल भंडार से तेल निकालने की तैयारी शुरू कर दी है। वहीं दक्षिण कोरिया ने लगभग 30 वर्षों में पहली बार ईंधन की कीमतों पर ऊपरी सीमा तय की है।
वियतनाम और थाईलैंड:
वियतनाम ने ईंधन आयात शुल्क हटा दिया है और कच्चे तेल का निर्यात रोक दिया है। थाईलैंड ने भी ईंधन निर्यात निलंबित कर दिया है।
श्रीलंका और नेपाल:
दोनों देशों में पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लग रही हैं और सरकारें लोगों से घबराहट में खरीदारी न करने की अपील कर रही हैं।
पश्चिमी देशों में भी बढ़ी चिंता
अमेरिका:
पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। स्थिति संभालने के लिए अमेरिकी प्रशासन ने तेल टैंकरों को नौसैनिक सुरक्षा देने की पेशकश की है।
यूरोप और ब्रिटेन:
यूरोप में गैस की कीमतों में 64 से 67 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। ब्रिटेन में गैस की कीमतें एक सप्ताह में लगभग दोगुनी हो गई हैं।
पश्चिम एशिया के उत्पादक देश:
निर्यात मार्ग बंद होने और भंडारण क्षमता भर जाने के कारण इराक ने तेल उत्पादन में 70 प्रतिशत तक कटौती की है, जबकि कुवैत ने भी उत्पादन घटा दिया है।

भारत पर असर
अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच संघर्ष का असर भारत पर भी दिखने लगा है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत तेल आयात करता है, जिसमें से करीब 40 प्रतिशत तेल खाड़ी देशों से होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है।
हालांकि भारत ने पिछले वर्षों में आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाकर स्थिति को काफी हद तक संभाल लिया है। अब देश का लगभग 60 प्रतिशत कच्चा तेल रूस, अमेरिका, पश्चिम अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों से आ रहा है।
गैस संकट बना चिंता का विषय
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक है और इसकी अधिकांश आपूर्ति खाड़ी देशों से आती है। संकट के चलते एलपीजी की कीमतों में 60 से 115 रुपये तक और एलएनजी की कीमतों में करीब 80 रुपये की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
सरकार के आपात कदम
सरकार ने रसोई गैस की आपूर्ति बनाए रखने के लिए आवश्यक सेवा रखरखाव अधिनियम (ESMA) लागू कर दिया है। साथ ही रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए गए हैं।
रिफाइनरियों पर असर
आपूर्ति में कमी के कारण कुछ रिफाइनरियों को उत्पादन घटाना पड़ा है। मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स ने अपनी एक यूनिट बंद कर दी है और विदेशी खरीदारों को पेट्रोल निर्यात करने में असमर्थता जताते हुए फोर्स मेज्योर घोषित किया है।
पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर, लेकिन लोगों में चिंता
भारत में फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर हैं। देश के पास लगभग आठ सप्ताह का रणनीतिक तेल भंडार मौजूद है। इसके बावजूद कीमतों में संभावित बढ़ोतरी की आशंका के चलते कई शहरों में पेट्रोल पंपों पर लोगों की लंबी कतारें देखी जा रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया में यह संघर्ष लंबा चला तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और आम लोगों की जेब पर लंबे समय तक पड़ सकता है।



