March 12, 2026 - 1:32 am

₹20 हजार करोड़ के गेन बिटकॉइन घोटाले में बड़ी कार्रवाई, डार्विन लैब्स के सह-संस्थापक आयुष वार्ष्णेय गिरफ्तार

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केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने करीब ₹20,000 करोड़ के बहुचर्चित गेन बिटकॉइन क्रिप्टोकरेंसी घोटाले में बड़ी कार्रवाई करते हुए डार्विन लैब्स के सह-संस्थापक आयुष वार्ष्णेय को गिरफ्तार कर लिया है। अधिकारियों ने बुधवार को यह जानकारी दी।

सीबीआई के अनुसार, आयुष वार्ष्णेय इस मामले के प्रमुख आरोपियों में शामिल हैं। उनके खिलाफ पहले ही लुक आउट सर्कुलर (एलओसी) जारी किया गया था। सोमवार को जब वह देश छोड़कर भागने की कोशिश कर रहे थे, तब मुंबई एयरपोर्ट पर अलर्ट जारी होने के बाद उन्हें हिरासत में लिया गया। इसके बाद मंगलवार को उन्हें औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया।

डार्विन लैब्स ने तैयार किया था डिजिटल ढांचा
जांच एजेंसी के मुताबिक, डार्विन लैब्स ने वह डिजिटल ढांचा तैयार किया था, जिस पर कथित तौर पर गेन बिटकॉइन घोटाले की पूरी तकनीकी प्रणाली आधारित थी। जांच में डार्विन लैब्स प्राइवेट लिमिटेड और इसके सह-संस्थापकों आयुष वार्ष्णेय, साहिल बघला और निकुंज जैन की भूमिका सामने आई है। निकुंज जैन वर्तमान में वाओमी एआई के संस्थापक और चीफ कैपिटल ऑफिसर भी बताए जा रहे हैं।

सीबीआई का आरोप है कि इन लोगों ने मिलकर एमसीएपी नामक क्रिप्टो टोकन और उससे जुड़े ईआरसी-20 स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट को डिजाइन और विकसित किया था, जिसका इस्तेमाल कथित क्रिप्टो पोंजी स्कीम में किया गया।

जांच में यह भी सामने आया है कि डार्विन लैब्स ने कई महत्वपूर्ण डिजिटल प्लेटफॉर्म तैयार किए थे। इनमें GBMiners.com नामक बिटकॉइन माइनिंग पूल प्लेटफॉर्म, बिटकॉइन पेमेंट गेटवे, कॉइन बैंक बिटकॉइन वॉलेट और गेन बिटकॉइन वेबसाइट शामिल हैं। इन प्लेटफॉर्म के जरिए निवेशकों से संपर्क कर निवेश कराया जाता था।

2015 में शुरू हुई थी योजना
सीबीआई के अनुसार यह घोटाला वर्ष 2015 में ‘गेन बिटकॉइन’ नाम से शुरू हुआ था, जिसे कथित तौर पर वेरिएबलटेक प्राइवेट लिमिटेड के नाम पर संचालित किया जा रहा था। जांच एजेंसी के मुताबिक, इस योजना का मास्टरमाइंड अमित भारद्वाज (अब मृत) और उसका भाई अजय भारद्वाज थे।

इस योजना में निवेशकों को 18 महीने तक हर महीने 10 प्रतिशत तक बिटकॉइन रिटर्न देने का लालच दिया जाता था। लोगों को बाहरी एक्सचेंज से बिटकॉइन खरीदकर गेन बिटकॉइन में तथाकथित क्लाउड माइनिंग कॉन्ट्रैक्ट के जरिए जमा करने के लिए कहा जाता था।

सीबीआई के अनुसार यह मॉडल मल्टी-लेवल मार्केटिंग (एमएलएम) आधारित पोंजी स्कीम था, जिसमें पुराने निवेशकों को भुगतान नए निवेशकों से आने वाले पैसे से किया जाता था। शुरुआती दौर में बिटकॉइन में भुगतान होने के कारण लोगों को यह योजना लाभदायक लगने लगी।

बाद में अपने टोकन में भुगतान
हालांकि 2017 के बाद जब नए निवेशकों का प्रवाह कम हुआ, तो कंपनी ने अचानक भुगतान बिटकॉइन के बजाय अपने ही बनाए क्रिप्टो टोकन एमसीएपी में करना शुरू कर दिया, जिसकी कीमत बिटकॉइन की तुलना में काफी कम थी। इससे निवेशकों को भारी नुकसान हुआ।

देशभर में दर्ज हुईं कई एफआईआर
इस बड़े घोटाले को लेकर जम्मू-कश्मीर से महाराष्ट्र और दिल्ली से पश्चिम बंगाल तक कई एफआईआर दर्ज की गई थीं। मामले की व्यापकता और अंतरराष्ट्रीय पहलुओं को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी थी।

सीबीआई अब पूरे घोटाले की परतें खोलने, इसमें शामिल अन्य लोगों की पहचान करने और निवेशकों से हड़पे गए धन का पता लगाने के लिए जांच आगे बढ़ा रही है। एजेंसी विदेशों में भेजे गए फंड की भी पड़ताल कर रही है।

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