March 12, 2026 - 1:32 am

Movies On Passive Euthanasia: इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट की अनुमति, ‘गुजारिश’ ही नहीं; इन फिल्मों में भी दिखाई गई इच्छा मृत्यु की कहानी

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जीवन को जहां एक खूबसूरत उपहार माना जाता है, वहीं मृत्यु एक अटल सत्य है। हर व्यक्ति चाहता है कि जीवन और मृत्यु दोनों ही प्राकृतिक और सहज रूप से हों। लेकिन कई बार परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं जब परिवार और करीबी लोग कठिन निर्णय के दोराहे पर खड़े हो जाते हैं।

कुछ ऐसी ही स्थिति 31 वर्षीय हरीश राणा के परिवार के सामने है। वर्ष 2013 में हुए एक हादसे के बाद से हरीश कोमा में हैं। लंबे समय तक इलाज के बावजूद उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ। आखिरकार माता-पिता ने बेटे के लिए इच्छामृत्यु की अनुमति मांगते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दे दी।

इच्छामृत्यु जैसे संवेदनशील विषय पर भारतीय सिनेमा में भी कई फिल्में बन चुकी हैं। हालांकि इनमें से बहुत कम फिल्में व्यावसायिक रूप से सफल रहीं। आम तौर पर इस विषय पर बनी फिल्मों में लोगों को सबसे ज्यादा फिल्म ‘गुजारिश’ याद आती है। आइए जानते हैं ऐसी ही कुछ फिल्मों के बारे में।

‘शायद’

1979 में आई फिल्म ‘शायद’ को भारतीय सिनेमा की शुरुआती फिल्मों में गिना जाता है, जिसने इच्छामृत्यु जैसे संवेदनशील मुद्दे को उठाया। फिल्म में नसीरुद्दीन शाह और सिमी गरेवाल मुख्य भूमिकाओं में नजर आए। कहानी यह सवाल खड़ा करती है कि क्या किसी लाइलाज बीमारी से पीड़ित मरीज को जीने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए।

‘गुजारिश’

संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बनी यह फिल्म 2010 में रिलीज हुई थी। इसमें ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म में एक जादूगर एथन मस्करेन्हा की कहानी दिखाई गई है, जो हादसे के बाद लकवाग्रस्त हो जाता है और अदालत से इच्छामृत्यु की मांग करता है। इसे इच्छामृत्यु पर आधारित मुख्यधारा की बॉलीवुड फिल्मों में से एक माना जाता है।

‘सलाम वेंकी’

2022 में रिलीज हुई यह फिल्म रेवती के निर्देशन में बनी है। काजोल और विशाल जेठवा अभिनीत यह फिल्म एक सच्ची कहानी पर आधारित है। इसमें एक युवक की गरिमापूर्ण मृत्यु और अंगदान के लिए यूथेनेशिया की कानूनी लड़ाई को दिखाया गया है।

‘पुपा’

2018 में आई बंगाली फिल्म ‘पुपा’ का निर्देशन इंद्रशीष आचार्य ने किया है। फिल्म की कहानी एक एनआरआई के इर्द-गिर्द घूमती है, जो कोमा में पड़े अपने पिता की देखभाल के लिए भारत लौटता है और भावनात्मक व नैतिक दुविधा में फंस जाता है।

‘पैसिव यूथेनेशिया: कहानी करुणा की’

साल 2014 में आई यह डॉक्यूमेंट्री निर्देशक चेतन शाह ने बनाई थी। यह फिल्म अरुणा शानबाग के ऐतिहासिक मामले पर आधारित है और भारत में पैसिव यूथेनेशिया को अनुमति देने वाले 2011 के फैसले और ‘लिविंग विल’ की जरूरत पर प्रकाश डालती है।

क्या था अरुणा शानबाग मामला

भारत में इच्छामृत्यु पर सबसे बड़ी बहस 2011 में अरुणा शानबाग मामले के बाद शुरू हुई। अरुणा शानबाग मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में नर्स थीं। वर्ष 1973 में अस्पताल के ही एक वार्ड बॉय ने उनके साथ दुष्कर्म किया और कुत्तों को बांधने वाली जंजीर से गला घोंटने की कोशिश की। इस घटना के बाद दिमाग तक ऑक्सीजन नहीं पहुंचने से वह कोमा में चली गईं। करीब 42 वर्षों तक कोमा में रहने के बाद 18 मई 2015 को उनका निधन हो गया।

विदेशी फिल्मों में भी उठा विषय

इच्छामृत्यु पर विदेशी सिनेमा में भी कई फिल्में बनी हैं। स्पेनिश फिल्म ‘द सी इनसाइड’ रेमन साम्पेड्रो की सच्ची कहानी पर आधारित है, जिन्होंने 28 वर्षों तक इच्छामृत्यु के अधिकार के लिए संघर्ष किया। वहीं ‘मिलियन डॉलर बेबी’ (2004) में एक मुक्केबाज और उसके कोच के बीच के रिश्ते के साथ जीवन के अंतिम निर्णय की संवेदनशीलता को दिखाया गया है।

इसके अलावा 1981 में आई ‘हूज लाइफ इज इट एनीवे?’ और 2021 की फिल्म ‘डॉर्मेंट ब्यूटी’ भी इस विषय को अलग-अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती हैं।

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