देहरादून/केदारनाथ। उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ी इलाकों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ मानी जाने वाली एम्स की हेलि एंबुलेंस अब खुद बदहाल व्यवस्था की प्रतीक बन गई है। कभी जिंदगी बचाने के लिए आसमान चीरने वाली यह सेवा पिछले एक साल से केदारनाथ में खड़ी-खड़ी जंग खा रही है, जबकि जिम्मेदार एजेंसियां आंख मूंदे बैठी हैं।
मई 2025 में हुई दुर्घटना के बाद से क्षतिग्रस्त हेलि एंबुलेंस आज तक हेलीपैड के पास ही पड़ी है। हैरानी की बात यह है कि न तो इसे हटाने की जहमत उठाई गई और न ही अनुबंध के मुताबिक नई हेलि एंबुलेंस की व्यवस्था की गई। इससे न सिर्फ सिस्टम की सुस्ती उजागर हो रही है, बल्कि दूरस्थ क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और आपदा प्रबंधन के दावों की भी पोल खुल रही है।
तीन दिन में बदलनी थी एंबुलेंस, एक साल से इंतजार
अनुबंध के अनुसार, हेलि एंबुलेंस के खराब होने या दुर्घटनाग्रस्त होने पर संबंधित कंपनी को तीन दिन के भीतर नई एंबुलेंस उपलब्ध करानी थी। लेकिन हकीकत यह है कि एक साल बीतने के बावजूद न तो नई एंबुलेंस आई और न ही पुरानी को हटाया गया। क्षतिग्रस्त हेलि एंबुलेंस अब भी केदारनाथ में उसी स्थिति में पड़ी है।
सात महीने में थम गई सेवा की रफ्तार
एम्स की यह हेलि एंबुलेंस सेवा शुरू होने में ही दो साल का समय लग गया था। 20 सितंबर 2022 को तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इसकी घोषणा की थी। इसके बाद 29 अक्तूबर 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्चुअल माध्यम से इसका उद्घाटन किया।
हालांकि, शुरू होने के महज सात महीने बाद ही 17 मई 2025 को एक महिला मरीज को लेने के दौरान हार्ड लैंडिंग में हेलि एंबुलेंस दुर्घटनाग्रस्त हो गई और सेवा पूरी तरह ठप हो गई।
पहाड़ के मरीजों के लिए बनी थी ‘जीवनरेखा’
यह सेवा उत्तराखंड के दूरस्थ पहाड़ी इलाकों, खासकर उत्तरकाशी और चमोली जिलों के लिए काफी लाभकारी साबित हो रही थी। कई गंभीर मरीजों और गर्भवती महिलाओं को समय पर उपचार मिल सका था। चारधाम यात्रा के दौरान भी इसे तीर्थयात्रियों के लिए ‘लाइफलाइन’ बताया गया था, लेकिन सेवा एक भी यात्रा सीजन में सुचारू रूप से संचालित नहीं हो पाई।
फिर शुरू करने के दावे, जमीन पर सन्नाटा
एम्स के पीआरओ डॉ. श्रीलॉय मोहंती के अनुसार, गंभीर रोगियों और घायलों को हेलि के माध्यम से एम्स लाने के लिए राज्य सरकार का सहयोग मिल रहा है। सेवा को दोबारा शुरू करने के लिए पत्राचार और प्रयास जारी हैं।
फिलहाल, केदारनाथ में खड़ी यह क्षतिग्रस्त हेलि एंबुलेंस सिस्टम की लापरवाही और अधूरे वादों की मूक गवाह बनी हुई है।



