June 9, 2026 - 2:28 am

Supreme Court: यूसीसी पर विचार का समय आया, लेकिन शरीयत कानून में बदलाव संसद का अधिकार

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि देश में अब इस विषय पर लंबित से विचार करने का समय आ गया है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि शरीयत कानून की धाराओं को रद्द करने जैसे संवेदनशील मुद्दों पर अंतिम निर्णय लेना विधायिका का अधिकार क्षेत्र है।

मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने की, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति आर. महादेवन शामिल थे। पीठ 1937 के मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की कुछ धाराओं को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में इन प्रावधानों को मुस्लिम महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण बताया गया है।

महिलाओं के अधिकारों पर जताई चिंता

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि यदि न्यायालय शरीयत कानून के उत्तराधिकार संबंधी प्रावधानों को रद्द कर देता है तो इससे एक कानूनी शून्य (लीगल वैक्यूम) पैदा हो सकता है, क्योंकि मुस्लिम उत्तराधिकार को नियंत्रित करने वाला कोई अन्य स्पष्ट कानून मौजूद नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण से कहा कि सुधार की जल्दबाजी में ऐसा कदम उठाना उचित नहीं होगा, जिससे महिलाओं को मौजूदा स्थिति से भी कम अधिकार मिल जाएं। उन्होंने सवाल किया कि यदि 1937 का शरीयत कानून समाप्त हो जाता है तो उसकी जगह कौन-सी व्यवस्था लागू होगी।

संसद को निर्णय का अधिकार

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने भी कहा कि याचिका में भेदभाव का मुद्दा गंभीर है, लेकिन इस विषय पर निर्णय लेना संसद के लिए अधिक उपयुक्त होगा। उन्होंने कहा कि संविधान के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में समान नागरिक संहिता लागू करने का दायित्व विधायिका को दिया गया है।

पीठ ने यह भी कहा कि पहले भी कई बार अदालत संसद से यूसीसी लागू करने पर विचार करने की सिफारिश कर चुकी है। अदालत के अनुसार सामाजिक और व्यक्तिगत कानूनों में व्यापक सुधार के लिए विधायी प्रक्रिया ही सबसे उपयुक्त रास्ता है।

याचिकाकर्ता की दलील

इस दौरान अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि अदालत यह घोषणा कर सकती है कि मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों के बराबर उत्तराधिकार अधिकार मिलना चाहिए। उनका तर्क था कि यदि शरीयत कानून की विवादित धाराएं हटाई जाती हैं तो ऐसे मामलों में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम लागू किया जा सकता है।

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