May 19, 2026 - 10:28 am

Roorkee: गोबर गैस से रोशन हुआ गांव, अब गोशाला से बिजली बनाने की तैयारी; ग्राम प्रधान स्वामी घनश्याम की सोच लाई रंग

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एलपीजी की बढ़ती कीमतों और ऊर्जा संकट के बीच हरिद्वार के एक गांव ने आत्मनिर्भरता की ऐसी मिसाल पेश की है, जो पूरे देश के लिए प्रेरणा बन सकती है। ग्राम प्रधान की दूरदर्शी सोच ने न केवल लावारिस गोवंश को नया सहारा दिया, बल्कि गांव को रसोई गैस पर निर्भरता से भी काफी हद तक मुक्त कर दिया। अब गोशाला से बिजली उत्पादन की दिशा में भी तैयारी शुरू हो गई है।

हरिद्वार जिले की इब्राहिमपुर मसाई ग्राम पंचायत के हलजौरा गांव के प्रधान स्वामी घनश्याम ने बताया कि दो वर्ष पहले ऊर्जा संकट को देखते हुए उनके मन में गोबर गैस संयंत्र स्थापित करने का विचार आया। इसके लिए उन्होंने स्वच्छ भारत मिशन स्वजल हरिद्वार के अधिकारियों से संपर्क कर विस्तृत परियोजना तैयार की, जिसे स्वीकृति मिलने के बाद वर्ष 2023 में ग्राम पंचायत को स्वजल निधि से 20 लाख रुपये की धनराशि प्राप्त हुई।

इस धनराशि से करीब एक बीघा भूमि में गड्ढा तैयार कर उसे भीतर से पक्का कराया गया। इसके बाद लोहे का एयरटाइट डाइजेस्टर चैंबर बनाया गया। जैसे-जैसे गैस का दबाव बढ़ता है, चैंबर ऊपर उठता जाता है। यहीं से पाइपलाइन के माध्यम से गांव के 40 घरों तक गैस की आपूर्ति की जा रही है। संयंत्र के रखरखाव और विस्तार के लिए प्रत्येक परिवार ग्राम पंचायत को 300 रुपये प्रतिमाह जमा कर रहा है।

प्रधान स्वामी घनश्याम ने बताया कि अब गोशाला के माध्यम से गांव के लिए बिजली उत्पादन की योजना पर भी काम चल रहा है। परियोजना के तहत बैल और बछड़ों की मदद से टरबाइन चलाकर बिजली तैयार की जाएगी। इससे गांव ऊर्जा के क्षेत्र में और अधिक आत्मनिर्भर बन सकेगा।

यह गोशाला अपने आप में अनोखी है। यहां 51 गोवंश हैं, जिनमें 40 बछड़े और बैल शामिल हैं। 11 गायों में से केवल एक ही दूध देती है, इसके बावजूद गोशाला आत्मनिर्भर बनी हुई है। गोबर गैस संयंत्र ने इसे आर्थिक रूप से मजबूत किया है और गोसेवा का उत्कृष्ट उदाहरण भी पेश किया है। प्रधान ने बताया कि यदि गोशाला नहीं होती तो गोबर बाहर से मंगाना पड़ता, जिससे किराया और डीजल पर अतिरिक्त खर्च होता। अब पशुओं के चारे का खर्च भी लगभग शून्य है, क्योंकि सभी पशु दिनभर जंगल में चरते हैं और शाम को आश्रय स्थल में लौट आते हैं।

गोबर गैस संयंत्र से निकलने वाली जैविक खाद की मांग भी लगातार बढ़ रही है। किसान इसे हाथों-हाथ खरीद रहे हैं। अब यहां केंचुओं की मदद से वर्मी कंपोस्ट खाद तैयार करने की योजना पर भी काम चल रहा है।

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