March 29, 2026 - 2:47 am

पश्चिम एशिया में जंग का एक महीना: ईरान को भारी नुकसान, अमेरिका-इस्राइल भी फंसे; हर हफ्ते बदला युद्ध का चेहरा

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अमेरिका और इस्राइल द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू किए गए युद्ध को एक महीना पूरा हो गया है। इस दौरान पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक, सैन्य और आर्थिक तस्वीर पूरी तरह बदल गई है। चार हफ्तों में जहां ईरान के शीर्ष नेतृत्व को बड़ा नुकसान हुआ, वहीं अमेरिका और इस्राइल भी भारी सैन्य और रणनीतिक दबाव में नजर आए। युद्ध का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर भी साफ दिखने लगा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह संघर्ष अब सीमित सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि लंबे क्षेत्रीय युद्ध में बदल चुका है।

पहला हफ्ता: नेतृत्व पर वार, युद्ध का तेजी से विस्तार

युद्ध की शुरुआत में अमेरिका-इस्राइल ने ईरान के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया। सर्वोच्च नेता अली खामेनेई सहित कई बड़े सैन्य अधिकारी मारे गए। इसके जवाब में ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमलों से इस्राइल, अमेरिकी ठिकानों और ऊर्जा केंद्रों को निशाना बनाया।

होर्मुज जलडमरूमध्य बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई और कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल पार कर गईं। लेबनान में हिजबुल्ला के शामिल होने से संघर्ष का दायरा और बढ़ गया।

मानवीय स्तर पर पहले ही हफ्ते में ईरान में 1300 से अधिक लोगों की मौत हुई, जबकि लेबनान में बड़े पैमाने पर विस्थापन शुरू हो गया।

दूसरा हफ्ता: युद्ध लंबा खिंचने के संकेत

दूसरे हफ्ते तक साफ हो गया कि ईरान की सरकार गिरने वाली नहीं है। अमेरिका और इस्राइल ने हमले तेज किए, वहीं तेहरान में तेल डिपो पर हमलों के बाद “काली बारिश” जैसी स्थिति बनी।

ईरान ने भी होर्मुज क्षेत्र में जहाजों को निशाना बनाया और सऊदी अरब तक हमले फैलाए।

राजनीतिक मोर्चे पर मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता घोषित किया गया। इस दौरान तेल कीमतें 110 डॉलर तक पहुंच गईं और वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा गया।

तीसरा हफ्ता: ऊर्जा ठिकाने बने निशाना, टकराव और घातक

तीसरे हफ्ते में युद्ध ने नया रूप ले लिया। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के ऊर्जा ढांचे पर हमले शुरू कर दिए। ईरान की मिसाइलों ने इस्राइल की रक्षा प्रणाली भेदते हुए बड़े ठिकानों को नुकसान पहुंचाया।

इस्राइल ने ईरान के गैस फील्ड पर हमला किया, तो जवाब में ईरान ने कतर और अन्य ऊर्जा केंद्रों को निशाना बनाया।

इस दौरान अमेरिका के भीतर भी विरोध बढ़ा और एक वरिष्ठ अधिकारी ने इस्तीफा दे दिया। लेबनान में हालात और बिगड़ते हुए मृतकों का आंकड़ा 1000 पार कर गया।

चौथा हफ्ता: कूटनीति की कोशिशें, लेकिन युद्ध जारी

चौथे हफ्ते में अमेरिका ने बातचीत की कोशिशों का दावा किया, लेकिन जमीनी स्तर पर सैन्य गतिविधियां और तेज हो गईं। अमेरिका ने हजारों अतिरिक्त सैनिक तैनात किए।

इस्राइल ने ईरान के औद्योगिक और परमाणु ठिकानों पर हमले किए, जबकि ईरान ने पूरे क्षेत्र में जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी।

ईरान ने अमेरिका के युद्धविराम प्रस्ताव को खारिज कर दिया। वहीं, लेबनान में इस्राइल की जमीनी कार्रवाई तेज हो गई और क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया।

मानवीय संकट: हजारों मौतें, लाखों बेघर

एक महीने में ईरान में करीब 2000 लोगों की मौत हो चुकी है। लेबनान में 1100 से अधिक लोग मारे गए और 12 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हुए।

इस्राइल में भी नागरिक हताहत हुए, जबकि अमेरिकी सैनिकों की मौत और घायल होने की खबरें सामने आई हैं। संयुक्त राष्ट्र ने इसे गंभीर मानवीय संकट बताया है।

आर्थिक असर: तेल, शेयर बाजार और महंगाई पर मार

युद्ध का सबसे बड़ा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतें 112 डॉलर प्रति बैरल पार कर गईं।

ऊर्जा संकट के चलते भारत सहित कई देशों में महंगाई का दबाव बढ़ा है। शेयर बाजारों में भारी गिरावट दर्ज की गई है—भारत में एक महीने में करीब 10% गिरावट देखी गई।

चार हफ्तों में यह युद्ध सीमित टकराव से निकलकर व्यापक क्षेत्रीय संकट बन चुका है। न तो कोई पक्ष पीछे हटने को तैयार है और न ही कूटनीतिक प्रयास सफल हो पाए हैं।

अगर यह संघर्ष आगे भी जारी रहता है, तो इसके परिणाम सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पूरी दुनिया को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

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