काशीपुर। तराई पश्चिमी वन प्रभाग के काशीपुर रेंज में जंगल अब नाममात्र को ही बचा है। कभी इस रेंज में करीब 20 फीसदी वन क्षेत्र हुआ करता था, जो घटकर अब महज एक फीसदी रह गया है। वहीं तहसील क्षेत्र में 30 फीसदी से अधिक भूमि कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो चुकी है।
कभी तराई क्षेत्र को फसल उत्पादन के लिए ‘मिनी पंजाब’ कहा जाता था, लेकिन राज्य गठन के बाद तेजी से प्रॉपर्टी कारोबार बढ़ा। प्रॉपर्टी डीलरों ने गांवों में सस्ते दामों पर कृषि भूमि खरीदकर मानकों की अनदेखी करते हुए प्लॉटिंग शुरू कर दी। खरीदारों को भूखंड बेच दिए जाते हैं और मकान निर्माण वे स्वयं करते हैं। इन अवैध कॉलोनियों में न तो पर्याप्त सड़कें हैं, न सार्वजनिक स्थान, न ही सीवर जैसी मूलभूत सुविधाएं।
काशीपुर-कुंडेश्वरी, काशीपुर-जसपुर, काशीपुर-रामनगर, काशीपुर-अलीगंज और काशीपुर-दढ़ियाल मार्ग पर लगभग 60 फीसदी भूमि प्लॉटिंग में बिक चुकी है। नियमानुसार नदी तट से 200 मीटर के भीतर निर्माण प्रतिबंधित है, इसके बावजूद ढेला नदी के किनारे कॉलोनियां बस चुकी हैं और मकान भी बन गए हैं।
इन क्षेत्रों में फैला था जंगल
काशीपुर रेंज में गोविंदपुर, चांदपुर, मानपुर, कचनालगाजी, गढ़ी इंद्रजीत, प्रतापपुर, जसपुर खुर्द, नीझड़ा, ढकिया गुलाबो, सरवरखेड़ा, बैलजुड़ी, कुंडेश्वरी, स्कॉर्ट फार्म, कुमाऊं-गढ़वाल ब्लॉक, शंकरपुरी, कुआंखेड़ा, मालवा फार्म और हिम्मतपुर समेत कई क्षेत्रों में कभी घना जंगल था। वन विभाग के पूर्व अधिकारियों के अनुसार पिछले 20-25 वर्षों में यहां तेजी से जंगल कटे और कॉलोनियां बसती चली गईं।
गोविंदपुर में बचा 10 हेक्टेयर जंगल
वर्तमान में काशीपुर रेंज के गोविंदपुर क्षेत्र में ही करीब 10 हेक्टेयर जंगल शेष है, जिसकी सुरक्षा में वन कर्मी जुटे हैं। कुछ वन क्षेत्र ढेला नदी किनारे बचा हुआ है। चांदपुर, मानपुर और फिरोजपुर जैसे गांव जंगल से सटे होने के कारण यहां जंगली जानवरों की आवाजाही बनी रहती है।
पॉलीथिन से बढ़ा खतरा, पशु और मानव दोनों प्रभावित
काशीपुर। प्रतिबंध के बावजूद पॉलीथिन का उपयोग थमने का नाम नहीं ले रहा है। शहर और गांवों में खुले में फेंके गए पॉलीथिन के ढेर पर्यावरण के साथ-साथ पशु-पक्षियों और इंसानों के लिए भी गंभीर खतरा बन चुके हैं।
लोग घरों का कूड़ा पॉलीथिन में बांधकर फेंक देते हैं, जिसे आवारा पशु भोजन समझकर खा जाते हैं। इससे उनके स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ता है। सब्जी मंडियों के आसपास कूड़े में मवेशी अक्सर पॉलीथिन निगल लेते हैं।
राजकीय पशु चिकित्सालय के डॉ. मुकेश चंद्र पांडे के अनुसार, पॉलीथिन पेट में जमा होने से मवेशियों का पाचन तंत्र प्रभावित होता है। वे जुगाली करना बंद कर देते हैं, जिससे एंजाइम नहीं बन पाते और गोबर करने में भी दिक्कत होती है।
प्रतिबंध के बावजूद जारी उपयोग
पॉलीथिन पर प्रतिबंध के बावजूद दुकानदार इसका खुलेआम इस्तेमाल कर रहे हैं। हाल ही में आयोजित चैती मेले में भी प्रतिबंध के बावजूद पॉलीथिन का उपयोग होता रहा, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
जानवरों के लिए खतरा
- कूड़े के साथ प्लास्टिक खाने से पशुओं के पेट में गांठ बन जाती है।
- पाचन क्रिया प्रभावित होने से वे भोजन छोड़ देते हैं।
- खच्चर और घोड़े कैल्शियम की कमी में सीमेंट के कट्टे और गत्ता तक खा जाते हैं।
मानव स्वास्थ्य पर असर
- पॉलीथिन में जमा पानी से मच्छर पनपते हैं, जिससे डेंगू और मलेरिया का खतरा बढ़ता है।
- प्लास्टिक जलाने पर निकलने वाली जहरीली गैसें सांस और त्वचा रोगों का कारण बनती हैं।
- माइक्रोप्लास्टिक भोजन और पानी के जरिए शरीर में पहुंचकर बीमारियां बढ़ा रहा है।
पर्यावरण पर असर
- नालियां और सीवर जाम होने से जलभराव की समस्या बढ़ती है।
- प्लास्टिक मिट्टी की उर्वरता को नष्ट कर रहा है।
(पृथ्वी दिवस विशेष)



